बरेली। श्रीरामलीला सभा ब्रह्मपुरी के तत्वावधान में आयोजित 165वीं रामलीला के अंतर्गत भगवान श्रीराम, सीता विवाह, कैकयी-दशरथ संवाद, भरत संवाद और श्रीराम के वनवास जाने की लीला का मंचन किया गया।
गुरु व्यास मुनेश्वर जी महाराज ने कथा का वर्णन करते हुए बताया कि राजा दशरथ अपने ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम का राज्याभिषेक करने की तैयारी कर रहे थे, जिससे पूरी अयोध्या आनंदित थी। लेकिन मंथरा ने रानी कैकेयी को भ्रमित कर दिया और उसने राजा दशरथ से दो वरदान मांग लिए—
1. भरत को अयोध्या का राजा बनाना
2. राम को 14 वर्षों का वनवास देना
इससे राजा दशरथ को गहरा आघात लगा, लेकिन वह अपने वचनों से बंधे थे। भारी हृदय से उन्होंने श्रीराम को वन जाने की अनुमति दी। श्रीराम, माता सीता और भाई लक्ष्मण के साथ वनवास के लिए निकल पड़े।
भरत ने ठुकराया सिंहासन
भरत जब अपनी ननिहाल से लौटे और इस अन्याय का पता चला तो उन्होंने कैकयी से कहा—
“कैसा राजतिलक, कौन सा सिंहासन,
मृत काया भला कब करती शासन!
यह तिलक नहीं कलंक तूने लगाया है,
शर्म न आयी, कैसा मातधर्म निभाया है!”
भरत ने सिंहासन को अस्वीकार कर दिया और राम की चरण पादुका लेकर अयोध्या लौटे।
निषाद गंगा घाट पर भव्य शोभायात्रा
प्रवक्ता विशाल मेहरोत्रा ने बताया कि अगले दिन निषाद गंगा घाट (नाव) की शोभायात्रा निकाली जाएगी और केवट संवाद की लीला साहूकारा, तुलसी गली में होगी।
राम भक्तों का सहयोग सराहनीय
रामलीला समिति के अध्यक्ष राजू मिश्रा ने राम बारात की भव्यता के लिए सभी भक्तों और पदाधिकारियों का आभार जताया। संरक्षक सर्वेश रस्तोगी, महामंत्री सुनील रस्तोगी, कोषाध्यक्ष राजकुमार गुप्ता, लीला प्रभारी अखिलेश अग्रवाल समेत अन्य पदाधिकारी आयोजन में शामिल रहे।